
नई दिल्ली। वर्ष 2018 में जब राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की सरकार ने अपनी सेना के सबसे महत्वपूर्ण कमांड यूएस पैसिफिक कमांड (यूएसपाकोम) का नाम बदल कर यूएस इंडो पैसिफिक कमांड (यूएसइंडोपाकोम) कर दिया तो यह माना गया है कि यह अमेरिकी रणनीति में हिंद महासागर के साथ ही भारत के बढ़ते महत्व का द्योतक है।अब इस फैसले के तकरीबन छह वर्ष बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में 16 जून, 2026 को यूएसइंडोपाकोम का नाम बदल कर वापस यूएस पैसिफिक कमांड कर दिया है। यह फैसला 1947 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन द्वारा स्थापित मूल नाम और कमांड की 70 वर्ष पुरानी गौरवशाली विरासत को बहाल करने के उद्देश्य से लिया गया है।

2018 में दिया था यूएस इंडो पैसिफिक कमांड नाम
अमेरिका के पैसिफिक कमांड का क्षेत्र अब भी पश्चिमी अमेरिका से भारत की पश्चिमी समुद्री सीमा तक फैला हुआ है और जमीनी तौर पर भारत के साथ अमेरिकी सैन्य सहयोग पर कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। वर्ष 2018 में अमेरिकी रक्षा विभाग ने जब इस कमांड के नाम के साथ हिंद महासागर का नाम जोड़ा तो इसे अमेरिकी सैन्य रणनीति में भारत की बढ़ती अहमियत के तौर पर देखा गया था।
उक्त नाम में बदलाव की घोषणा 30 मई 2018 को करते हुए तत्कालीन रक्षा सचिव जेम्स मैटिस ने हवाई में कमांड चेंज-ऑफ-कमांड समारोह में इसके लिए जो वजहें बताई थी उसमें चीन की विस्तारवादी नीतियों व क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर भारतीय और प्रशांत महासागरों के बीच बढ़ती कनेक्टिविटी को स्थापित करना बताया था।
मैटिस ने क्षेत्रीय सुरक्षा के भारत की भूमिका को बताया था अहम
मैटिस ने इसे भारत की बढ़ती भूमिका और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में भारत को शामिल करने के प्रतीक के रूप में पेश किया था, जो चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा था।
बाद में जब अमेरिका की नई नेशनल रक्षा नीति लागू की गई तो उसमें इंडो-पैसिफिक शब्द को प्रमुखता दी गई ताकि भारत सहित दक्षिण एशिया को भी इस व्यापक रणनीतिक फ्रेमवर्क में शामिल किया जा सके।
पूर्व विदेश सचिव निरूपमा मेनन राव ने एक्स पर लिखा है कि, “पहले ट्रंप का “डेड इकोनॉमी” (भारत को लेकर) वाला बयान, रायसीना डायलॉग में लैंडाउ (अमेरिका के विदेश राज्य मंत्री) का चेतावनी भरा बयान कि चीन वाली ‘गलती’ दोबारा न दोहराई जाए, भारतीय नाविकों की मौत और मार्को रुबियो के साथ हुई तीखी बहस।
पीएम मोदी ने जी-7 में ‘विश्वास की कमी’ पर जोर दिया
जी-7 में मोदी द्वारा वैश्विक स्तर पर ‘विश्वास की कमी’ पर दिया गया जोर। और अब इंडो-पैसिफिक प्रतीकवाद को डाउग्रेड करना। इनमें से कोई एक घटना अकेले में रणनीतिक संबंधों को खत्म नहीं करती। लेकिन सामूहिक रूप से ये संकेत दे रही हैं कि भारत-अमेरिका संबंधों का उत्साही और उल्लासपूर्ण चरण अब समाप्त हो रहा है। रिश्ता अब अधिक सामान्य और शायद अधिक कठिन होता जा रहा है।”
क्वाड के ताबूत में एक और कील- शशि थरूर
पूर्व विदेश राज्य मंत्री और कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इसे “क्वाड के ताबूत में एक और कील” करार दिया। उन्होंने एक्स पर लिखा, “क्वाड के ताबूत में एक और कील?”
वहीं देश के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने लिखा है कि, “तथ्य यह है कि भारत-अमेरिका संबंधों को सभी झटके ट्रंप और उनकी टीम द्वारा दिए गए हैं और वे अभी भी ऐसा करते जा रहे हैं। मोदी-ट्रंप की एवियन (फ्रांस) में प्रस्तावित बैठक से ठीक पहले उन्होंने यूएस इंडो पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर पैसिफिक कमांड कर दिया है।”
चीन के साथ संबंधों को सुधारने की कोशिश कर रहा अमेरिका
यहां गौरतलब है कि ट्रंप प्रशासन ने जिस तरह से चीन के साथ अपने संबंधों को सुधारने की कोशिश की है उससे क्वाड के भविष्य पर पहले से ही सवाल उठने लगे हैं। क्वाड नेताओं की आखिरी शिखर बैठक सितंबर 2024 में हुई थी, जबकि 2025 की बैठक टल गई।
हाल ही में क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठक भारत में हुई लेकिन इसमें अगले शिखर सम्मेलन को लेकर कुछ भी नहीं कहा गया। यह फैसला प्रतीकात्मक होते हुए भी भारत की रणनीतिक सोच के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है।




