भारत के कड़े तेवरों से पाकिस्तान में खलबली, पानी की जंग का अतीत; वर्तमान और भविष्य क्या? सिंधु जल समझौता.

पानी के दम पर आतंकवाद की फसल उगाने वाले पाकिस्तान के पापों का घड़ा अब पूरी तरह भर चुका है। भारत के कड़े तेवरों और सिंधु जल समझौते को ठंडे बस्ते में डालने के फैसले ने कंगाल और नापाक पड़ोसी पाकिस्तान की रीढ़ तोड़ दी है।

इस बात को ऐसे समझिए कि कभी पानी के सहारे हेकड़ी दिखाने वाला इस्लामाबाद आज बूंद-बूंद पानी और पाई-पाई के लिए तड़पने को मजबूर है। ‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते’ की नीति के तहत भारत ने जो रणनीतिक चक्रव्यूह रचा है, उसने पाकिस्तान को अपनी बदहाली और बेबसी पर आंसू बहाने को मजबूर कर दिया है।

पहले सिंधु जल समझौते के वर्तमान को समझते हैं

बात वर्तमान की करें तो पिछले छह दशकों से जिस सिंधु जल समझौते को दुनिया की सबसे सफल राजनयिक जीतों में गिना जाता था, आज वह इतिहास के सबसे बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। यह वही समझौता है जो भारत-पाकिस्तान के बीच कई युद्धों, आतंकी हमलों और दशकों की कड़वाहट के बाद भी कभी नहीं टूटा। लेकिन अब पानी सर से ऊपर जा चुका है।

इसका बड़ा कारण अप्रैल 2025 में हुआ पहलगाम आतंकी हमला है। इसके बाद भारत ने सख्त एक्शन लेते हुए इस समझौते को स्थगित कर दिया है। साफ शब्दों में कहे तो नई दिल्ली ने आतंकियों के पनाहगाह पाकिस्तान को उसकी औकात दिखाने और पानी को एक ‘रणनीतिक हथियार’ के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी तेज कर दी। 

इस बार पाकिस्तान की किरकिरी क्यों हो रही है?

इस बात को ऐसे समझिए कि पाकिस्तान हमेशा से भारत के पानी पर मौज करता आया है, लेकिन अब भारत ने जमीनी स्तर पर गेम बदल दिया है। इसी कारण पहले से कंगाल पाकिस्तान अब बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है। खैर, नापाक पड़ोसी के चिंता का विषय केवल यही नहीं है। 

इसके अलावा पाकिस्तान की चिंता का विषय चेनाब-ब्यास लिंक टनल प्रोजेक्ट भी है। इसको ऐसे समझिए कि भारत हिमाचल प्रदेश में 8.7 किलोमीटर लंबी एक टनल बनाने जा रहा है। इसके जरिए चेनाब की सहायक नदी ‘चंद्र नदी’ के पानी को मोड़कर ब्यास बेसिन में लाया जाएगा। यानी जो पानी बहकर पाकिस्तान जाता था, उसे भारत अपने इस्तेमाल में लेगा।

पश्चिमी नदियों पर ताबड़तोड़ प्रोजेक्ट्स

भारत ने सिंधु, झेलम और चेनाब (पश्चिमी नदियां) पर जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाओं को युद्धस्तर पर तेज कर दिया है। ऐसे में पाकिस्तान ने जब इस पर आपत्ति जताई और मध्यस्थता अदालत से भारत के खिलाफ फैसले दिलवाए, तो भारत ने साफ कह दिया कि हम ऐसी किसी ‘गैर-कानूनी’ अदालत को नहीं मानते। फलस्वरूप पाकिस्तान रोता रह गया और भारत अपने काम में लगा रहा।

indus waters treaty (1)

इतिहास की वो ‘उदारता’

अच्छा, अब इस बात को समझने के लिए भारत का यह कदम कितना बड़ा है, हमें 1947 के दौर में जाना होगा और इतिहास के पन्ने पलटने होंगे। शुरुआत से समझाएं तो जब भारत और पाकिस्तान बंटा, तो नहरों को नियंत्रित करने वाले हेडवर्क्स भारत में रह गए, जबकि लाखों एकड़ उपजाऊ जमीन और नहरों का जाल पाकिस्तान में चला गया।

इसके बाद अप्रैल 1948 में जब अस्थायी समझौता खत्म हुआ, तो पूर्वी पंजाब सरकार ने पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोक दिया। पाकिस्तान में हाहाकार मच गया। हालांकि, तत्कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप के बाद पानी बहाल कर दिया गया, लेकिन पाकिस्तान को समझ आ गया कि उसकी लाइफलाइन भारत के हाथ में है।

9 साल की बातचीत और ‘एकतरफा’ समझौता

इसके बाद आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में नेहरू और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने सिंधु जल समझौते पर दस्तखत किए।

कैसा था यह अजीबोगरीब समझौता? 

नदी का प्रकारनदियांपानी का हिस्सा (वार्षिक)भारत का नियंत्रणपाकिस्तान का नियंत्रण
पूर्वी नदियांरावी, ब्यास, सतलुजलगभग 33 MAF (20%) पूर्ण अधिकार (भारत अपनी मर्जी से इस्तेमाल कर सकता है)कोई अधिकार नहीं
पश्चिमी नदियांसिंधु, झेलम, चेनाबलगभग 135 MAF (80%) सीमित अधिकार (केवल घरेलू उपयोग, बिजली और सीमित सिंचाई)मुख्य अधिकार (बिना रोक-टोक इस्तेमाल)

इस समझौते की अजीब बात पर रौशनी डालें तो भारत ने न केवल पाकिस्तान को 80% पानी दे दिया, बल्कि पाकिस्तान में नहरें और बुनियादी ढांचा बनाने के लिए अपनी जेब से 6.2 करोड़ पाउंड (जो कि वर्तमान समय के अनुसार 79.47 करोड़ से 79.80 करोड़ रुपये) भी दिए। यह समझौता इसलिएअ भी अजीब था, क्योंकि वैश्विक इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि ऊपर बसा देश नीचे वाले देश को पानी भी दे और वहां इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के पैसे भी दे।

‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते’ की नीति

ध्यान देने वाली बात यह है कि दशकों तक भारत ने इस असमान समझौते को निभाया। कारगिल युद्ध और मुंबई हमलों के बाद भी भारत ने पानी नहीं रोका। लेकिन आतंकवाद को पालने वाले पाकिस्तान के लिए भारत का सब्र अब टूट चुका है। अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए कायराना आतंकी हमले के बाद भारत ने साफ कर दिया कि अब पानी को राजनीति से अलग नहीं रखा जाएगा। भारत ने समझौते को ‘ठंडे बस्ते’ में डाल दिया।

अदालती जंग में भी पाकिस्तान पस्त

पाकिस्तान ने इस मामले को लेकर कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का दरवाजा खटखटाया। मई 2026 में इस अदालत ने पाकिस्तान के पक्ष में फैसला देने की कोशिश की, लेकिन भारत ने दो टूक कह दिया कि हम इस एकतरफा फैसले को कचरे के डिब्बे में फेंकते हैं।

आतंकवाद के मुद्दे पर भारत का रुख साफ

कुल मिलाकर भारत के इस सख्त और साफ रुख से एक बात तो साफ हो गई है कि भारत अब रक्षात्मक मोड से निकलकर आक्रामक मोड में आ गया है। भारत अब पानी को सिर्फ एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के अचूक हथियार की तरह देख रहा है।

पाकिस्तान की कमर टूटना तय कैसे?

भारत के इस कदम से पाकिस्तान की कमर लगभग-लगभग तय मानी जा रही है। कारण है कि पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था पूरी तरह से इन्हीं पश्चिमी नदियों पर निर्भर है। अगर भारत अपने कानूनी अधिकारों का पूरा इस्तेमाल करते हुए पानी को रोकने या मोड़ने का काम पूरा कर लेता है, तो पाकिस्तान में सूखे और भुखमरी के हालात पैदा हो जाएंगे।

‘जैसी करनी, वैसी भरनी’ पाकिस्तान के करतूत के बाद ये कहावत इस्लामाबाद की स्थिति पर एकदम सटीक बैठती है। कभी भारत की उदारता का फायदा उठाकर हेकड़ी दिखाने वाला पाकिस्तान आज अपनी ही हरकतों की वजह से प्यासा मरने की कगार पर है, और भारत ने साफ कर दिया है कि अब बातचीत फाइलों में नहीं, जमीन पर टनल और बांध बनाकर होगी।

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