भजन क्लबिंग में दिखे प्रधानमंत्री मोदी, क्या है भक्ति और कॉन्सर्ट के मेल का ये नया ट्रेंड?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय पार्क में आयोजित एक भजन क्लबिंग में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद लोगों के साथ भजन का आनंद लिया। ये आयोजन पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर किया गया था। प्रधानमंत्री मोदी इससे पहले जनवरी में ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भी भजन क्लबिंग का जिक्र कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि भारत में भजन और कीर्तन सदियों से संस्कृति की आत्मा रहे हैं। मंदिरों और कथाओं में भजन सुने जाते रहे हैं और हर दौर में लोगों ने अपने समय के अनुसार भक्ति को अपनाया है। अब नई पीढ़ी भक्ति को अपने अनुभवों और जीवनशैली से जोड़ रही है। इसी सोच से एक नया सांस्कृतिक चलन सामने आया है, जिसे ‘भजन क्लबिंग’ कहा जा रहा है।

भजन क्लबिंग से क्या समझते हैं?

भजन क्लबिंग में भक्ति संगीत को आधुनिक कॉन्सर्ट जैसे माहौल में पेश किया जाता है। देश के अलग-अलग शहरों में युवा ऐसे आयोजनों में पहुंच रहे हैं। मंच को रोशनी और संगीत से सजाया जाता है और पूरा माहौल किसी बड़े कॉन्सर्ट जैसा दिखाई देता है, लेकिन यहां गाए जाने वाले गीत भजन होते हैं।

इन आयोजनों में आधुनिक संगीत वाद्ययंत्रों और स्टेज सेटअप के बीच कबीर के दोहे और मीरा के भजन भी सुनाई देते हैं। यानी प्रस्तुति का अंदाज आधुनिक है, जबकि संगीत का आधार पारंपरिक भक्ति है।

प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, मंच की सजावट, रोशनी और संगीत का अंदाज आधुनिक हो सकता है, लेकिन भजनों की भावना और उनके अर्थ को बनाए रखा जाता है।

युवाओं में क्यों बढ़ रही है दिलचस्पी?

भजन क्लबिंग में युवाओं की भागीदारी खास तौर पर दिखाई दे रही है। ‘बैकस्टेज सिब्लिंग्स’ से जुड़े राघव के मुताबिक, उनके कार्यक्रमों में आने वाले दर्शकों में 18 से 28 वर्ष की उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 85 फीसदी है।

राघव के अनुसार, भजन क्लबिंग के जरिए देश की कला और संस्कृति का संदेश लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से युवा अपनी सांस्कृतिक जड़ों, भजनों से मिलने वाले सुकून और उनसे मिलने वाली सीख को समझ रहे हैं।

भजन-कीर्तन की परंपरा का इतिहास क्या है?

भजन और कीर्तन की परंपरा भारत में किसी एक समय या किसी एक व्यक्ति से शुरू नहीं हुई। इसका विकास लंबे समय में भक्ति, कविता और संगीत के मेल से हुआ। अलग-अलग क्षेत्रों में संतों और भक्त कवियों ने अपने आराध्य के प्रति भक्ति को गीत और सामूहिक गायन के जरिए व्यक्त किया।



भारत सरकार के सेंटर फॉर कल्चरल रिसोर्सेज एंड ट्रेनिंग यानी सीसीआरटी के अनुसार, दक्षिण भारत के तमिल भाषी क्षेत्र में छठी-सातवीं शताब्दी के दौरान वैष्णव भक्ति साहित्य की मजबूत परंपरा विकसित हुई। इस दौर में 12 अलवार संत-कवियों ने भगवान विष्णु की भक्ति में गीतों की रचना की। इसी तरह छठी से आठवीं शताब्दी के बीच नयनार संत-कवियों ने भगवान शिव की स्तुति में भक्ति गीत लिखे।

इन रचनाओं के जरिए भक्ति को गीत और भावनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया गया। मध्यकाल तक भक्ति साहित्य लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में फैला।

मध्यकाल में भक्ति संगीत का विस्तार

मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के साथ भक्ति-काव्य और संगीत का दायरा भी बढ़ा। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं में देवी-देवताओं की स्तुति से जुड़े पद और गीत रचे जाने लगे।

ब्रज क्षेत्र में इस परंपरा ने विशेष रूप लिया। भारत सरकार के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र यानी आईजीएनसीए के अनुसार, 14वीं, 15वीं और 16वीं शताब्दी के भक्ति आंदोलन के दौरान ब्रज में भक्ति-संगीत का महत्वपूर्ण विकास हुआ। पुष्टिमार्ग की उपासना पद्धति में कीर्तन को संगीत और दूसरी कलाओं के साथ जोड़ा गया।

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