
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की नवंबर में लॉन्च होने वाली आत्मकथा- ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ (Belonging: A Journey of Love) को लेकर प्रकाशन से पहले ही विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल, हाल ही में सामने आया था कि किताब के प्रकाशन के अधिकार हासिल करने वाली कंपनी- पेंग्विन रैंडम हाउस ने भारत में सोनिया की आत्मकथा को प्रकाशित करने से हाथ पीछे खींच लिए। इसके बाद जहां कांग्रेस ने प्रकाशक कंपनी के इस फैसले के पीछे केंद्र के दबाव को वजह बताया, वहीं भाजपा ने पलटवार करते हुए इसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर प्रकाशक कंपनी और उसकी ओर से की गई ‘तथ्यों की जांच’ पर डाल दी।
पहले जानें- सोनिया गांधी की किताब के बारे में अब तक क्या सामने आया?
सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ के बारे में 18 अगस्त 2026 को एक कार्यक्रम में एलान किया गया था। इस किताब के वैश्विक प्रकाशक पेंग्विन रैंडम हाउस की सहयोगी कंपनी आल्फ्रेंड ए. नॉफ ने इसमें कहा था कि सोनिया गांधी की यह आत्मकथा 10 नवंबर को लॉन्च होगी। इसी के साथ किताब के कुछ अंशों की जानकारी दी गई थी। इसमें सोनिया गांधी की इटली से लेकर ब्रिटेन और फिर राजीव गांधी से शादी के बाद भारत में रहने के सफर के बारे में बताया गया। हालांकि, कुछ एक बातों को छोड़ दिया जाए तो किताब के जिन अंशों को कार्यक्रम में रिलीज किया गया, उसका एक बड़ा हिस्सा पहले से ही सार्वजनिक तौर पर मौजूद है।

किताब की सामग्री को लेकर क्या है शुरुआती जानकारी?
सोनिया गांधी की ओर से लिखे गए इस संस्मरण को उनके निजी और राजनीतिक जीवन का सबसे प्रामाणिक लेखा-जोखा बताया गया है, जिसमें कई अनछुए पहलुओं को साझा किया गया है।
इटली से भारत का सफर: किताब में 1965 में कैम्ब्रिज (इंग्लैंड) में राजीव गांधी से उनकी पहली मुलाकात, प्रेम कहानी और इटली के एक छोटे से कस्बे में बीते उनके बचपन का विवरण है।
भारतीय परिवेश को अपनाना: शादी के बाद भारत आना, अपनी सास इंदिरा गांधी से पहली मुलाकात, साड़ी पहनना, हिंदी बोलना सीखना और भारतीय जीवन शैली को आत्मसात करने की यादें।
व्यक्तिगत त्रासदियां: संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और सात साल बाद उनके पति राजीव गांधी की आत्मघाती बम धमाके में हुई हत्या और इसका जीवन पर प्रभाव।
राजनीति में प्रवेश: सोनिया गांधी ने संस्मरण में खुद माना है कि इन गहरे दुखों और व्यक्तिगत क्षति ने ही उन्हें अपनी गोपनीयता छोड़कर सार्वजनिक राजनीति में कदम रखने के लिए मजबूर किया।
प्रधानमंत्री पद ठुकराना: साल 2004 में कांग्रेस की ओर से चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री पद को अस्वीकार करने के अपने ऐतिहासिक निर्णय को उन्होंने इस पुस्तक में साझा किया है।
सोनिया गांधी की आत्मकथा पर लॉन्चिंग से पहले ही विवाद क्यों?
सोनिया गांधी की किताब के नवंबर 2026 में होने वाले वैश्विक रिलीज से पहले ही भारत में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया (पीआरएचआई) ने भारत में इस पुस्तक को प्रकाशित न करने का निर्णय लिया। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रकाशक कंपनी ने किताब की मूल स्क्रिप्ट में कुछ संपादकीय बदलावों और संवेदनशील हिस्सों को हटाने की मांग की, जिसे सोनिया गांधी ने स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद पेंग्विन ने इस प्रोजेक्ट से अपने कदम पीछे खींच लिए।
1. भारत में पेंग्विन ने सोनिया की किताब के प्रकाशन से वापस खींचे हाथ
पेंग्विन इंडिया ने स्पष्ट किया कि लेखक के साथ उनकी चर्चाएं पूरी तरह से गोपनीय थीं, इसलिए वे इस संबंध में आगे कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। प्रकाशक ने उन मीडिया रिपोर्ट्स को भी खारिज कर दिया है, जिनमें दावा किया गया था कि सोनिया गांधी की ओर से संपादकीय बदलावों को नामंजूर करने के बाद कंपनी ने इस किताब को न छापने का फैसला लिया। पेंग्विन का कहना है कि ऐसा कोई भी दावा परिस्थितियों को सही तरीके से बयां नहीं करता। बयान में कहा गया है कि सोनिया गांधी के साथ हुई सभी चर्चाओं के दौरान पेंग्विन इंडिया का रुख यही था कि वे इस पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए तैयार और उत्सुक थे।
2. पर भारत से बाहर पेंग्विन की सहायक कंपनी ही करेगी प्रकाशन
इस पूरे तथ्य में एक चौंकाने वाला पहलू यह रहा है कि जहां पेंग्विन रैंडम हाउस ने भारत में सोनिया की आत्मकथा का प्रकाशक न होने की बात कही है, वहीं उसका अमेरिकी सहयोगी (सब्सिडरी) आल्फ्रेड ए. नॉफ इस किताब को 10 नवंबर को लॉन्च करने वाला है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर मूल मैन्युस्क्रिप्ट वाली किताब छपने और भारत में उसी मैन्युस्क्रिप्ट को छापने से इनकार करने को लेकर विवाद गहरा गया है, जिसके चलते कांग्रेस ने प्रकाशक पर दबाव में आने का आरोप लगाया है।
कैसे एक आत्मकथा के प्रकाशन का मुद्दा कांग्रेस बनाम भाजपा बन गया?
सोनिया गांधी के संस्मरण के भारत में प्रकाशन को पेंग्विन इंडिया की ओर से टालने की खबर जैसे ही सामने आई, यह मुद्दा पूरी तरह से कांग्रेस बनाम भाजपा की राजनीतिक जंग में तब्दील हो गया। मौजूदा समय की बात करें तो यह विवाद साहित्य से हटकर पूरी तरह से राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। अशोक गहलोत, कमलनाथ जैसे कांग्रेस नेताओं और रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मुद्दे के राजनीतिकरण के पीछे सबसे बड़ी वजह वे तीन राष्ट्रीय मुद्दे हैं, जिन पर प्रकाशक और लेखक के बीच सहमति नहीं बन पाई।
1. कांग्रेस ने क्या आरोप लगाए
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार के दबाव में पेंग्विन इंडिया इन हिस्सों को संशोधित करवाना या हटाना चाहता था, जिसे सोनिया गांधी ने यह कहकर खारिज कर दिया कि ये विचार उनके खुद के अनुभव और दृष्टिकोण पर आधारित हैं और इनमें कोई बदलाव नहीं होगा।
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आरोप लगाया कि पेंग्विन का वैश्विक विंग इस किताब को मूल रूप में छापने को तैयार है, लेकिन पेंग्विन इंडिया केवल भारत में बदलाव चाहता है। उन्होंने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की हत्या करार दिया। उधर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सीधे प्रकाशक की स्वतंत्रता पर सवाल उठाते हुए पूछा, “क्या प्रकाशक तय करेगा कि सोनिया गांधी जैसी वरिष्ठ नेता क्या लिखेंगी और क्या नहीं?”
उधर लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने तंज कसा कि पेंग्विन इंडिया प्रधानमंत्री मोदी की पुस्तक एग्जाम वॉरियर्स और आरएसएस से जुड़ी कई किताबें छापने में तो बहुत खुश रहता है, लेकिन अब भाजपा सरकार इस पुस्तक के बाजार में आने से डर गई है। कांग्रेस सेवा दल और युवा कांग्रेस ने प्रकाशक को पल्टू पेंग्विन, बिकाऊ पेंग्विन और पेंग्विन जनता पार्टी कहकर निशाना साधा।

2. भाजपा ने कैसे किया पलटवार
भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के आरोपों का कड़ा विरोध किया और इसे डर का एक झूठा और पाखंड भरा नैरेटिव करार दिया। अमित मालवीय से लेकर भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सीआर. केशवन ने कांग्रेस के बयानों को पूरी तरह से आडंबर बताया है।
तो क्या भारत में किताब नहीं छपेगी?
ऐसा नहीं है कि यह किताब भारत में बिल्कुल नहीं छपेगी, लेकिन फिलहाल इसके घरेलू प्रकाशन और वितरण को लेकर अनिश्चितता की स्थिति जरूर बनी हुई है।
- सोनिया गांधी का यह संस्मरण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी प्रकाशक आल्फ्रेड ए. नॉफ की ओर से आगामी 10 नवंबर 2026 को अपने मूल स्वरूप में (बिना किसी बदलाव या काट-छांट के) रिलीज किया जा रहा है।
- पेंग्विन इंडिया द्वारा हाथ पीछे खींचने के बाद, भारत में इस पुस्तक के घरेलू वितरण और प्रकाशन के अधिकार हासिल करने के लिए हार्पर कॉलिन्स जैसे अन्य बड़े और प्रमुख प्रकाशन घराने रेस में शामिल हो चुके हैं और डील फाइनल करने की कोशिश कर रहे हैं।
- चूंकि किताब का वैश्विक लॉन्च अपने तय कार्यक्रम के मुताबिक हो रहा है और भारत के लिए अन्य पब्लिशर्स के साथ बातचीत चल रही है, इसलिए इस बात की उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही किसी अन्य प्रकाशक के जरिए यह किताब भारतीय बाजार में भी उपलब्ध हो जाएगी।
भारत में प्रकाशन में पहले कौन सी अहम किताबें फंसीं?
1. फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी
पेंग्विन रैंडम हाउस ने स्पष्ट किया था कि उसने पूर्व सेना प्रमुख की इस पुस्तक को प्रिंट नहीं किया है। पुस्तक के कुछ अंशों- जैसे गलवां घाटी में भारत-चीन सैन्य झड़प और अग्निपथ योजना के विवरण को लेकर विवाद था। यह पुस्तक रक्षा मंत्रालय से मंजूरी मिलने के इंतजार में रोकी गई थी। संसद में विपक्षी नेता राहुल गांधी द्वारा इसकी एक प्रति दिखाए जाने के बावजूद, लोकसभा अध्यक्ष ने इसके अंशों को सदन में पढ़ने पर रोक लगा दी थी।
2. द वंस एंड फ्यूचर रॉयट
मुजफ्फरनगर दंगों (2013) पर आधारित इस ग्राफिक उपन्यास को पेंग्विन इंडिया ने कानूनी, नियामक, व्यावसायिक और बाजार संबंधी चिंताओं की वजह से ऐन वक्त पर रिलीज करने से मना कर दिया था। प्रकाशक ने इसकी सामग्री को लेकर आपत्तियां जताई थीं, जिसमें मुख्य रूप से भारत का एक गलत नक्शा और संदर्भों का न होना शामिल था।
3. टुमारो समवन विल अरेस्ट यू
पेंग्विन इंडिया अनुबंध के तहत इसके प्रकाशन और वितरण के लिए बाध्य थी, लेकिन भारत में इसकी रिलीज तारीख से कुछ ही दिन पहले उसने हाथ पीछे खींच लिए। प्रकाशक ने अपने वकीलों की सलाह पर कहा था कि इस पुस्तक के वितरण में कानूनी जोखिम बहुत ज्यादा हैं। बाद में इस पुस्तक को भारत में जगरनॉट कंपनी की ओर से प्रकाशित किया गया था।
4. द हिंदूज: एन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री
यह भारतीय पुस्तक प्रकाशन इतिहास के सबसे विवादित मामलों में से एक है। पेंगुइन इंडिया ने धार्मिक भावनाओं को आहत करने के मुकदमों के डर से इस पुस्तक के भारतीय संस्करण को वापस ले लिया था और अपनी बची हुई सभी प्रतियों को नष्ट कर दिया था। यह कदम दक्षिणपंथी कार्यकर्ता दीनानाथ बत्रा के साथ लगभग चार साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद हुए समझौते के तहत उठाया गया था।
5. दिल्ली रॉयट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी
इस किताब को प्रकाशन समूह ब्लूम्सबरी ने भारी विवाद के बाद वापस ले लिया था। ब्लूम्सबरी के अन्य लेखकों ने आरोप लगाया था कि यह पुस्तक दंगों के असली पीड़ितों को ही आरोपियों के रूप में गलत तरीके से चित्रित करती है।




