
बिहार की सियायत में सोमवार का दिन एक बड़ी राजनीतिक उलटफेर का गवाह बना। इसे सालों तक याद रखा जाएगा। बांकीपुर उपचुनाव में जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने 30 वर्षों से भाजपा की किलेबंदी को ध्वस्त कर दिया। उनकी यह जीत इसलिए खास है कि लालू यादव के जमाने से बांकीपुर (पहले पटना पश्चिम विधानसभा) सीट भाजपा का गढ़ रहा है जिसकी चर्चा देशव्यापी हो रही है।
इस हार की कल्पना भाजपा ने भी नहीं की होगी क्योंकि यह भाजपा के राष्ट्रीय नितिन नवीन की रही है जिस पर वर्ष 2006 से वे जीते रहे थे। उनसे पहले 1995 के बाद से लगातार नितिन नवीन के पिता नवीन किशोर सिन्हा विधायक रहे थे।
पिता के निधन के बाद नितिन नवीन यहां से लगातार चुनाव जीते। ऐसे में इस हार की कल्पना भाजपा ने नहीं की होगी क्योंकि अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर भाजपा की जीत आसान मानी जा रही।
जन सुराज के प्रशांत किशोर के चुनाव मैदान में उतरते ही बांकीपुर का पालिटिकल सीन बदल गया। यहां पर राजनीतिक तापमान कुछ इस कदर बढ़ गया कि भाजपा को अपना प्रत्याशी तक बदलना पड़ा।
भाजपा ने पहले अपने कार्यकर्ता अभिषेक बंटी को प्रत्याशी बनाया और फिर उसे ड्राप कर नीरज कुमार सिन्हा को प्रत्याशी बनाकर प्रशांत किशोर के खिलाफ मैदान में उतारा। लेकिन, चुनावी नतीजे आते ही भाजपा ही नहीं, बल्कि अन्य राजनीतिक पार्टियां भी चौंक गई।
प्रशांत किशोर ने भाजपा के तमाम दिग्गज नेताओं के चुनाव प्रचार के बाद भी ऐतिहासिक जीत दर्ज की। उनकी जीत पर राजनीतिक गलियारे में राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा कई कारण गिनाए जा रहे हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कारण महत्वपूर्ण बताए जा रहे हैं।

भाजपा को प्रत्याशी बदलना पड़ा भारी
राजनीतिक गलियारों में कुछ इस तरह की खूब चर्चा हो रही है कि भाजपा को चुनाव में प्रत्याशी बदलना भारी पड़ गया। भाजपा के जिस प्रत्याशी अभिषेक बंटी को नामांकन का जश्न मनाया और उसमें मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी समेत एनडीए के बड़े नेताओं की भागीदारी रही उस प्रत्याशी ने नामांकन के दूसरे दिन ही अपना नाम वापस ले लिया।
इसके कई कारण गिनाए गए। उन कारणों को प्रशांत किशोर की टीम बड़ा मुद्दा बना सकती थी। इस आशंका में भाजपा ने रणनीतिक बदलाव करते हुए नया उम्मीदवार दिया। माना जा रहा है कि भाजपा के इस निर्णय से जनता में यह संदेश गया कि पार्टी प्रत्याशी के चयन तक में सतर्क नहीं है। इसका चुनाव पर असर पड़ा।
प्रशांत किशोर के मैदान में आने से चुनावी माहौल बदला
भाजपा के गढ़ में प्रशांत किशोर के खुद उतरने से चुनावी माहौल बदल गया। बांकीपुर सीट चर्चा में आ गई और सबकुछ हाईप्रोफाइल हो गया। प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी जनता में अपना नैरेटिव गढ़ने में आगे रही, जबकि इस मामले भाजपा पिछड़ गई।
प्रशांत किशोर ने जनता के बीच पाजिटिव प्रचार और सरकार पर हमला के जरिये चुनावी माहौल बदल दिया। उन्होंने प्रचार के दौरान लोगों के घर-घर जाकर मिले और भाजपा से नाराज तबके को साधने की रणनीति बनाई। स्थानीय मुद्दों को प्रचार आगे रखा। इसका चुनावी फायदा मिला।
भाजपा के समर्थकों में उत्साह की रही कमी
बांकीपुर उपचुनाव पर करीबी से नजर रखने वाले कई प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि इस बार भाजपा के समर्थकों और कार्यकर्ताओं में पिछले चुनाव की तरह उत्साह नहीं दिखी। उनके समर्थक मतदाताओं ने भी बूथ पर जाने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई।
यूं कहें कि भाजपा अपने कैडर मतदाताओं को चुनाव के लिए उत्साहित नहीं कर पायी। कुछ हद तक पार्टी कार्यकर्ताओं में भी उदासी रही। जबकि भाजपा यहां से आसान जीत की उम्मीद में थी।
चुनावी प्रबंधन में आगे रही जनसुराज
माना जाता है कि चुनावी प्रबंधन में भाजपा की टीम बेजोड़ है। लेकिन, बांकीपुर में भाजपा के कार्यकर्ता घर-घर जाकर मतदाताओं को बूथ तक ले जाने में असफल रहे।
वहीं, जन सुराज की टीम वोटर मैनजमेंट में आगे रही। जन सुराज के कार्यकर्ता अपने मतदाताओं को बूथ तक ले जाने में सफल रहे बल्कि सत्ता विरोधी लहर का भी खूब फायदा उठाया।
छात्र आंदोलन का भी रहा असर
इस उपचुनाव में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन का भी असर माना जा रहा है। यह माना जाता है कि युवा वोटर भाजपा के प्रबल समर्थक है, लेकिन बांकीपुर उपचुनाव को लेकर युवाओं में ज्यादा उत्साह नहीं देखने को मिला।
महागठबंधन के समर्थक भी जनसुराज के पक्ष में वोट डाले
पिछले साल विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की ओर से राजद प्रत्याशी रेखा गुप्ता दूसरे स्थान पर रही थी। इस बार उपचुनाव में वो तीसरे स्थान पर आ गईं। जानकारों का मानना है कि विशेषकर राजद के एक बड़ा समर्थक छिटकर जन सुराज के प्रशांत किशोर के पक्ष में मतदान किया।




