
चुनाव आयोग यानी लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी। यह संवैधानिक संस्था देश में चुनाव संपन्न कराती है। तीन सदस्यों वाली इस संस्था के उम्मीद की जाती है कि किसी भी फैसले पर तीनों की राय एक हो, लेकिन सवाल ये है कि क्या हमेशा चुनाव आयुक्तों की राय एक ही रही है, तो इसका जवाब है, नहीं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखवीर सिंह संधू और विवेक जोशी के ताजा मामले ने एक बार फिर इतिहास में हुए घटनाक्रमों की ओर देखने को मजबूर किया है।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि SIR प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयुक्त सुखवीर सिंह संधू और विवेक जोशी बीते 10 महीनों में 14 बार आपत्ति जता चुके हैं। इस दावे के बाद सियासी हलकों में भूचाल आ गया है। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है, वहीं बीजेपी ने इसे स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी बताया है।
यह पहली बार नहीं है जब चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर दो अलग-अलग राय रही हों, पहले भी कई बार ऐसी बातें सामने आ चुकी हैं। इनमें सबसे बड़ा आरोप तो देश में चुनाव आयोग की शक्तियों के नए सिरे से परिभाषित करने वाले टीएन शेषन पर लगता है कि वे अपने सहयोगी आयुक्तों को मीटिंग तक के लिए नहीं बुलाते थे।

अशोक लवासा की अलग राय
ये बात 2019 के लोकसभा चुनाव के समय की है, तब तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने पीएम मोदी और तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े आदर्श आचार संहिता मामले में आयोग के बहुमत के फैसलों पर अलग राय रखी। कई मामलों में आयोग ने बहुमत के आधार पर बयानों को आचार संहिता उल्लंघन नहीं माना, जबकि लावासा की उन मामलों पर राय अलग थी।
जब ऐसा-कई बार हुआ तो उन्होंने खुद को आचार संहिता से जुड़े मामलों की बैठकों से अलग कर लिया, उन्होंने तर्क दिया कि जब उनकी असहमति को शामिल ही नहीं किया जाता तो बैठकों में शामिल होने का कोई मतलब नहीं है।
एन. गोपालस्वामी VS नवीन चावला
ये एक ऐसा मामला था जो भारत के चुनाव आयोग के इतिहास पहली बार सामने आया था, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने सहयोगी चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश कर दी थी। इस घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया।
ये मामला साल 2009 का है, तब तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन.गोपालस्वामी पर एक राजनीतिक दल के लिए पक्षपातपू्र्ण तरीके का आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश भेज दी थी।
टीएन शेषन VS एमएस गिल-जीवीजी कृष्णमूर्ति
1990 के दशक में टीएन शेषन देश के मुख्य चुनाव आयुक्त थे। साल 1993 में राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग में दो और चुनाव आयोग नियुक्त कर दिए, इसी के साथ अब तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था बन गया। टीएन शेषन ने इस फैसले को चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
जुलाई 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि संविधान बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की परिकल्पना करता है, इसलिए निर्णयों में मुख्य चुनाव आयुक्त से साथ चुनाव आयुक्तों की भूमिका भी अहम है। अगर किसी मुद्दे पर तीनों की राय अलग होती है तो फैसला बहुमत के आधार पर लागू होगा। यही व्यवस्था आयोग के भीतर असहमतियों का आधार बनी।
एमएस गिल-जीवीजी कृष्णमूर्ति ने टीएन शेषन पर आरोप लगाए थे कि वे उन्हें आयोग के काम में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं करते थे। शेषन पर तो यहां तक आरोप लगे हैं कि वे आयोग की बैठकों में अपने सहयोगी आयुक्तों को बुलाते तक नहीं थे, सारे फैसले खुद ही लेते थे।




