लोकतंत्र की हत्या का खुला षड़यंत्र है संसद में प्रश्नकाल का स्थगन


लेखक: विजय श्रीवास्तव (सहायक आचार्य, अर्थशास्त्र विभाग , लवली प्रोफेशनल विश्वविद्यालय)
सह-लेखक: आशुतोष चतुर्वेदी

प्रसिद्धि राजनीतिक विश्लेषक चंद्रप्रकाश भावरी ने अपनी पुस्तक “भारत में लोकतंत्र” में विकास और लोकतंत्र के बीच गहरे अंतर संबंधों को परिभाषित करते हुए लिखा था कि, एक लोक कल्याणकारी राज्य में विकास का प्रथम घटक लोकतांत्रिक तरीके से संसद में विमर्श करना है |

आजादी के पश्चात देश में जितनी भी सरकारें रहीं उन्होंने इस लोकतांत्रिक विमर्श की प्रक्रिया का सदैव ही सम्मान किया है और विपक्ष की आलोचनाओं को विकास नीतियों में स्थान दिया | यह एक स्वतंत्र और स्वस्थ्य लोकतंत्र का सूचक था | किंतु वर्तमान मोदी सरकार अलोकतांत्रिक नीतिगत निर्णय लेना चाहती है और वो भी बिना संसदीय विमर्श के | बिना संसदीय बहसों के किए गए निर्णय प्रकृति इसे अलोकतांत्रिक और विघटनकारी है| इसका एक उदाहरण कोरोना महामारी की आड़ में संसद को प्रश्नकाल से मुक्त करना भी है | प्रश्नकाल का यह स्थगन सरकार की लोकतांत्रिक तानाशाही को ही दिखाता है |

कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देकर सत्ता में आने वाली मोदी सरकार महामारी की आड़ में संवैधानिक परंपराओं का उल्लंघन कर रही है |ये स्थिति और विकराल हो जाती है जबकि देश की मुख्यधारा का प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सार्वजनिक हित के मुद्दों शिक्षा, रोजगार और महामारी के कारण हुई खाद्य असुरक्षा के बजाय सरकार की झूठी उपलब्धियों का पाखंड पूर्ण प्रदर्शन करें |

सरकार द्वारा प्रश्नकाल स्थगन करने का विरोध स्वयं उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू और नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद कर चुके हैं| सवाल उठाने का अधिकार जन प्रतिनिधियों से छीनना एक प्रकार से सरकार की वैचारिक तानाशाही है | देश की खस्ताहाल आर्थिक हालात स्वयं सरकार भी अनभिज्ञ नहीं है | किंतु कांग्रेस मुक्त भारत के साथ-साथ विपक्ष विहीन और सवाल विहीन संसद देश पर थोपने का मकसद जनहित के मुद्दों पर जनता के सवालों से मुंह चुराना है |

एक तरफ सरकार जहां बड़े-बड़े उपक्रमों का निजीकरण बिना किसी ठोस आर्थिक आधार पर किए जा रही है तो वहीं दूसरी और महामारी के कारण सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था भी चरमरा गई है | बेरोजगारी खाद्य असुरक्षा आर्थिक असुरक्षा अपने चरम पर है , किंतु सरकार भावनात्मक मुद्दों और धार्मिक ध्रुवीकरण को हवा देकर देश को बहुत गहरे संकट में डाल रही है | अब ऐसे में आत्मनिर्भर भारत की बात करना राजनीतिक पाखंड के अलावा कुछ भी नहीं है |

विपक्ष और जनप्रतिनिधियों के सवाल से डरी हुई सरकार से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है ? प्रश्नकाल स्थगन केवल संसदीय परंपरा का ही नहीं बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र का भी अपमान है जनप्रतिनिधियों द्वारा संसद में बहस करना उनका मूल अधिकार है और उनके चुभते हुए सवाल सरकार को दिशा देने का कार्य करते हैं | किंतु भाजपा के नेता इसे फर्जी विमर्श कहकर इन चुभते सवालों से बिना सामना किए भाग जाना चाहते हैं | कटु शब्दों में कहें तो सवालों से भागने की यह परंपरा लोकतंत्र की हत्या के षड्यंत्र का खुला कदम दिखता है| इस खुले षड्यंत्र का विरोध हो भी तो कैसे हो? क्योंकि विरोध के स्वर दबाने के लिए ही तो प्रश्नकाल समाप्त किया जा रहा है |

अतएव दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विपक्षी दल के सभी जनप्रतिनिधियों को एकजुट होकर एक जन क्रांति करनी होगी और जनता को यह समझना होगा कि जनप्रतिनिधियों की आवाज दबाना वास्तव में जनता की आवाज दबाना है| आशा है कि विपक्षी दल राजनीतिक विद्वेष से ऊपर उठकर एकजुटता दिखाते हुए संसदीय बहस की प्रश्न काल की गरिमा को बचा पाने में सफल होगें |

(ये लेखक के निजी विचार हैं)


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