महात्मा गांधी के स्वदेशी विचार के विपरीत है मोदी का आत्मनिर्भर भारत


लेखक: विजय श्रीवास्तव (सहायक आचार्य, अर्थशास्त्र विभाग, लवली प्रोफेशनल विश्विद्यालय)
सह-लेखक: दीपक कौशल

जहां एक और महात्मा गांधी ने अपनी स्वदेशी की संकल्पना में एक अहिंसक समाज के निर्माण का स्वप्न देखा और इसका आधार उन्होंने अपने सत्य , अहिंसा, सत्याग्रह और समता के सिद्धांतों को बनाया किन्तु मोदी का आत्म निर्भर भारत गांधीवाद की इन अवधारणाओं से कोसों दूर है | महात्मा जी का अहिंसक -आर्थिक समाज विकेन्द्रीकृत मध्यम और लघु तकनीक के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्वस्था को सुदृढ़ करने की बात करता है , वहीं मोदी की आत्मनिर्भरता की सोच केंद्रीकृत बड़े उद्योगों और शहरी अर्थ तंत्र के लिए है | स्वदेशी की संकल्पना में आर्थिक असमानताओं के लिए कोई स्थान नहीं है ,जबकि मोदी के आत्म निर्भरता और मेक इन इंडिया से भारत को केवल वाणीहींन , रोजगारहीन और क्रूर आर्थिक वृद्धि ही प्राप्त होगी जहां आय और सम्पत्ति की असमानताएं चरम पर होंगी |

मोदी जी के आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना से गांधीवादी समाजवाद के किसी भी लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि गांधी की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में उनके रचनात्मक कार्यक्रम और एक वैकल्पिक सभ्यता की भी झलक दिखाई देती है , जो कि श्रम की महत्ता, सत्याग्रह, आर्थिक समानता, संघर्ष समाधान को लक्ष्य मानकर चलती है | गांधी ,राजनीतिक और आर्थिक विकेंद्रीकरण को साधन और साध्य दोनों मानकर चलते हैं ,जबकि मेक इन इंडिया की अवधारणा लाभ -आधारित बाजार व्यवस्था, पूंजीवादी शोषण, श्रम का शोषण और आर्थिक संघर्ष को जन्म देने वाली है | गांधी जहां एक और अर्थव्यवस्था की उन्नति के लिए किसी भी प्रकार के ऋण या बाहरी सहायता को अस्वीकार देते हैं ,वहीं दूसरी और मोदी आयायित तकनीक के माध्यम से भारत को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं ,जो कि भारत जैसी श्रम प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं है|

गांधीजी की स्वदेशी की संकल्पना उनके सामाजिक ,राजनीतिक और शैक्षिक विचारों का भी एक समावेश करती है जिसका आधार सत्याग्रह है | जिसमें व्यक्ति और संस्थाएं अन्याय पूर्ण आर्थिक निर्णयों का अहिंसक विरोध कर सकती हैं , किन्तु जहां प्रतिरोध के स्वर कुचले जा रहे हों वहां इसकी आशा कम है | यह भी समझना चाहिए कि गांधी की स्वदेशी की संकल्पना उस भारत के लिए है जहां पर शिक्षा भी (नई तालीम) के माध्यम से चरित्र के निर्माण के लिए दी जाएं और यह नई तालीम छोटी-छोटी और परंपरागत ग्रामीण हस्तकलाओं को संरक्षित करके ही पाई जा सकती है | जबकि वर्तमान संदर्भ में दी जाने वाली शिक्षा नई तालीम के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन करती है |

मोदी जी की राजनीतिक अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यही है कि सत्याग्रह ,,अहिंसा समता और समानता के गांधीवादी विचार को न समझती है और न ही अपनाती | धार्मिक संघर्ष, ध्रुवीकरण , और सामाजिक वैमनस्य पैदा करके गांधी के स्वदेशी और सत्याग्रह के समाज को नहीं अपनाया जा सकता | आत्मनिर्भरता का मोदी का नारा गांधी के स्वदेशी और गांधीवाद का खुला अपमान है |आत्मनिर्भरता के नाम पर माननीय प्रधानमंत्री, गांधी जी का सम्मान करने का नकली प्रपंच रचते हैं | क्योंकि गांधी के राम राज्य के विचार में आत्मनिर्भरता और स्वदेशी का अर्थ समाज के किसी भी प्रकार भेदभाव, वैमनस्य और हिंसा का उन्मूलन है , जबकि मोदी जी का नया भारत अल्पसंख्यकों के लहू पर बहुसंख्यको का मानसिक तुष्टीकरण करता है| मोदी द्वारा स्वदेशी को राष्ट्रवाद की चासनी में लपेट कर परोसा जाता है |

स्वदेशी सिर्फ एक आर्थिक नहीं बल्कि दार्शनिक और पवित्र विचार है, जो रचनात्मक सिद्धांतों के माध्यम से समाज को एकता के सूत्र में पिरो के रखना चाहता है | नए भारत में जहां गौ रक्षा के नाम पर हिंसक आंदोलन और दंगे कराये जाते हों, वहां आत्मनिर्भरता की बात करना पाप करके गंगा में धोने जैसा है| जब तक गौ रक्षा, राम राज्य, धर्म के नाम पर निर्दोषों का कत्ल किया जाए गा, वहां घरेलू उद्योगों उत्पादन और आत्मनिर्भरता हासिल करने के बावजूद समाज ठगा सा महसूस करेगा| मोदी और उनके तथाकथित भक्तों को यह बात समझनी ही होगी कि बिना अहिंसा के गांधी के भारत की कल्पना भी अविश्वसनीय सी लगती है | इसलिए पहले वे स्वयं सत्याग्रह और सामाजिक समरसता के गांधी के विचारों का गहन अध्ययन करें और उसे अपनाएं तब जाकर आत्म निर्भर भारत की तुलना स्वदेशी जैसे पवित्र विचार से करें | अंत में बस यही कहा जा सकता है कि कूड़ेदान के ऊपर गांधी का चश्मा लगाकर उन्हें स्वच्छ भारत का दरोगा ना बनाकर अहिंसा का विचारों का एक विचारक ही रहने दिया जाए | पर क्या ? मोदी जी से समझेंगे|


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