वर्ण आधारित शोषणकारी अर्थव्यवस्था का ही नया रूप है निजीकरण


वर्ष २००३ में जब केंद्र में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार थी, तब उनकी निजीकरण की नीति को लेकर प्रसिद्ध सामाजिक और दलित चिंतक कंवल भारती ने “गरीबी और भुखमरी के अर्थशास्त्र” के शीर्षक से एक लेख था। यह लेख तत्कालीन सरकार की निजीकरण की नीति और डा. अम्बेडकर के इस परिप्रेक्ष्य में उनके विचार को बहुत ही सारगर्भित रूप में प्रस्तुत करता है। इस लेख के कुछ विचार वर्तमान सरकार की निजीकरण पर भी लागू होते हैं। कंवल भारती की पुस्तक “जाति धर्म और राष्ट्र” के उस लेख के विचारों को ही यह लेख नए सिरे से देखने का प्रयास मात्र है। कंवल भारती तर्क देते हैं कि” निजीकरण की अर्थव्यवस्था के बहुत सारे तत्व वर्णव्यवस्था में पहले से मौजूद हैं और हिन्दू हिंसक अर्थव्यवस्था इसी वर्णव्यवस्था पर आधारित हैं।

यह तर्क एकदम सही प्रतीत होता है क्योंकि जहां एक ओर निजीकरण आर्थिक संसाधनों पर एक वर्ण विशेष का एकाधिकार स्थापित होगा तो वहीं दूसरी ओर एक वर्ग विशेष को इन संसाधनों से वंचित कर देगा। निजीकरण से समाज में आर्थिक विषमताएं बढ़ेंगी और बाद में यही आर्थिक विषमताएं सामाजिक विभेद और को भी अधिक बलवान करेंगी। कहने का अर्थ यह है कि, निजीकरण की नीति भारतीय अर्थव्यवस्था में पहले से मौजूद जाति आधारित आर्थिक विषमताओं को और बढ़ायेंगी। इसके पीछे एक बहुत बड़ा छिपा हुआ उद्देश्य है। ये छिपा हुआ एजेंडा ब्राह्णवादी मनु स्मृति के समाज की रचना से जुड़ा हुआ है। वास्तव में यह निजीकरण की नीति ब्राह्मणवादी हिंदू हिंसक आर्थिक ढांचे को मजबूत करेगी, जिसका अर्थ यह है कि आत्मनिर्भरता के नाम पर समाज के निम्न वर्ग के और पिछड़े वर्ग को पिछड़ा ही रहने दिया जाए। प्रश्न नौकरियों के सरकारी रोजगार का नहीं !! प्रश्न वर्ण आधारित स्वरोजगार की कोरी अवधारणाओं को बल प्रदान करने का है। जो अमीर हैं, साधन सम्पन्न हैं, वे सभी संसाधनों पर स्वामित्व स्थापित कर लेंगे और खेतिहर मजदूर, कामगार श्रमिकों की आने वाली पीढ़ियां स्वरोजगार के मायाजाल में पड़कर उच्च शिक्षा से वंचित रह जाएंगी।

सरकारी तंत्र में रोजगार की आशा, निम्न व पिछड़े वर्ग को उच्च शिक्षा पाने के लिए उत्प्रेरक का काम करती है। निजी क्षेत्र में यह केवल कुछ हद तक लागू होता है क्योंकि पूंजीपति का अंतिम उद्देश्य श्रम के शोषण से लाभ कमाना है। अब यदि पिछड़े और दलित पढ़ेगें ही नहीं तो बढ़ेंगे कैसे ? निजीकरण का सबसे बड़ा नुकसान यही है कि यह आर्थिक तंत्र को कम लेकिन सामाजिक संरचना को बहुत बुरी तरह प्रभावित करेगा। उच्चवर्ग वाले पूजीपतियों के पास श्रमिक अपनी सेवाएं देंगे और शोषित होंगे क्योंकि उसके लिए उसके लिए आजीविका और परिवार का भरण पोषण भी आवश्यक है। सरकारी तंत्र में उच्च पदों पर नियुक्त होने से दलित और पिछड़े को ही समाज में सम्मानजनक रोजगार और धन संचय का अवसर मिलता था किंतु निजीकरण उनके हाथों से ये छीन लेगा और मनुस्मृति और ब्राह्णवादी विचार हावी हो जायेगें।

सरकार मनु स्मृति की ये बात लागू करना चाहती है। “ब्राह्मण की सेवा करते हुए” यदि शूद्र का जीवन निर्वाह न हो तो वह क्षत्रिय की सेवा करें यदि उससे भी पेट ना भरे तो वह धनवान वैश्य की सेवा करके जीवन निर्वाह करें। इस सेवाकार्य से यदि वह कुछ भी भिन्न करता है तो वह उसके लिए निष्फल होता है।” निजीकरण के माध्यम से ब्राह्णवादी मनुवादी विचारधारा के पोषक यही करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि गरीब केवल निजी क्षेत्र को अपनी सेवा देकर केवल अपनी आजीविका चलाये क्योंकि यही उनका धर्म हैं। एक बात और यहां पर दृष्टिगत है कि कुछ गांधीवादी और लोहिया वादी इससे समाजवाद से जोड़कर देखेंगें और सेवा के साथ सामाजिक समसरता की बात करेंगे। गांधी और लोहिया के समाजवाद के लाख गुणों के बावजूद वर्ण व्यवस्था के संदर्भ में उनकी धारणाएं अम्बेडकरवादी समाजवादी की धारणाओं की तुलना में कमजोर हैं। अंबेडकर का मार्क्सवादी समाजवाद मानता है कि सामाजिक समता के बिना सामाजिक समसरता व्यर्थ है और सामाजिक समरसता लाने के लिए दलितों और पिछड़ों को सरकारी क्षेत्र में आर्थिक और सामाजिक संसाधनों में एक आनुपातिक प्रतिनिधित्व अत्यंत आवश्यक है, निजीकरण अनुपातिक प्रतिनिधित्व को कम करेगा और असमानता को और मजबूत करेगा।

निजीकरण, पूंजीवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र की फांसीवादी व्यवस्था है, जो सांस्कृतिक फासीवाद और बहिष्कृत राष्ट्रवाद के लिए मार्ग प्रशस्त करती है। करोड़ों गरीबों और पिछड़े में से एक-दो लाख ही लोगों को उच्च शिक्षा का पढ़ने लिखने का अवसर मिलेगा बाकी गरीब को गरीब बनाने की व्यवस्था और शोषण के तंत्र कायम रहे करने की व्यवस्था चलती रहेंगी। इस निजीकरण के विरोध के तर्क अंबेडकर और लोहिया के समाजवादी दर्शन को पढ़ने के बाद दूरदर्शिता से समझे जा सकते हैं। इसका हल दोनों का समाजवाद है, जहां लोहिया समृद्धि के समान बंटवारे की बात करते हैं, वहीँ भारत रत्न बाबा साहब अंबेडकर कृषि के औद्योगिकरण भूमि उद्योग बीमा के राष्ट्रीयकरण द्वारा पूंजी और संसाधनों के असमान वितरण को दूर करने की बात करते हैं। भूमि, कृषि और उद्योगों का पूंजीवादी ताकतों से नियंत्रित संचालित होने पर गरीबी और असमानताएं और बढ़ेगी, ऐसा आंबेडकर मानते थे।

महामारी और गलत आर्थिक निर्णयों से जनित आर्थिक मंदी से निपटने के लिए भी सरकारी स्वामित्व वाली इकाइयों का निजीकरण करना तीनों ही समाजवादी धाराओं के विपरीत है। गांधी, लोहिया व अंबेडकर का समाजवादी दर्शन इसे भारत की अर्थव्यवस्था के लिए निषिद्ध मानता है। निजीकरण के पैरोकार अर्थशास्त्री एवं चिंतक मनुस्मृति केवल आर्थिक व्यवस्था के हिमायती हैं और वे बौद्धिक ज्ञान और संसाधनों पर एक वर्ग विशेष विशेष का ही एकाधिकार चाहते हैं जो कि बाबासाहेब आंबेडकर के समाजवादी संविधानिक सोच के उलट है। इसलिए निजीकरण सामंतवादी व्यवस्था को फिर से पुनर्जीवित करेगा न केवल गरीब बल्कि मध्यम वर्ग भी शोषित होगा। क्या हम इस गरीबी के दुश्चक्र के साथ, हम इस सामाजिक असामानता के दुश्चक्र को सहन कर पायेगें।

लेखक: डा. विजय श्रीवास्तव, सहायक आचार्य, लवली प्रोफेशनल विश्विद्यालय)

सह-लेखक: आशुतोष चतुर्वेदी, स्वतंत्र लेखक

(लेखक के निजी विचार हैं)


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