महामारी के दौर में हस्तकलाओं का संरक्षण करना हमारा कर्तव्य


लेखक: विजय श्रीवास्तव (सहायक आचार्य, अर्थशास्त्र विभाग, लवली प्रोफेशनल विश्विद्यालय)
सह-लेखक: दीपक कौशल

कोरोना ने हमें एक अवसर दिया है कि हम अपने परम्परागत और हस्तशिल्पों की उपयोगिता जो समझें| हस्तशिल्प और ग्राम धारित उद्योगों से जो पूंजी निर्माण होता है ,उसका वितरण और परिचालन अपनी ही अर्थवव्यस्था को मजबूती देता है | अब तक ये धारणा बनी हुयी थी कि हस्त कलाओं की मांग भारत के बाजारों में कम और विश्व बाजारों में अधिक है , इसलिए सरकारों ने भी हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों को निर्यात संवर्धनं से जोड़ा | वैश्विक महामारी के बाद सम्भव है कि व्यापार प्रतिबंधों और आर्थिक क्रियाओं में संकुचन के कारण हस्तशिल्प की वैश्विक मांग में कमी आये ऐसे समय में घरेलूं क्षेत्र से उसे नैतिक और आर्थिक संबंल दोनों मिलना चाहिए |

अर्थशास्त्री राधेश्याम तिवारी की एक रिपोर्ट ने ये बात भी बताई थी कि ” मंदी , अकाल , और आपदाओं के दौर भी घरेलूं हस्तशिल्प उद्योग देश के रोजगार और निर्यात में बहुत बड़ा योगदान देते हैं | ” क्योंकि ये ग्राम आधारित हस्तशिल्प उद्योग शूमाकर की ” स्माल इज ब्यूटीफुल ” की अवधारणा पर चलते है | प्रादेशिक तौर भी भारत के कई राज्यों ने हस्तशिल्प बाजारों को विशाल बंनाने में सराहनीय काम किया , किन्तु वैश्विक भूमंडलीकृत अर्थवव्यस्था से जुड़े होने पर भी हस्तशिल्पकारों को उनके श्रम का वास्तविक मूल्य नहीं मिला |

उत्पादन की तकनीकों की मशीनीकरण होने के कारण , हस्तशिल्प उत्पाद प्रतिस्पर्धाओं का सामना नहीं कर सके और धीरे हस्तकारीगरों का ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की और पलायन बढ़ता गया | दूसरा इन हस्तकारों द्वारा उत्पादित वस्तुओं का मूल्य अन्य मशीनीकृत उत्पादों की तुलना में अधिक होता गया | जिससे इनकी मांग पर गहरा असर पड़ा | विदेश व्यापार में अन्य देशों द्वारा डम्पिंग किये जाने के कारण भी हस्तशिल्प बाजार भी कंगाली के दौर में आ गए | ये बात भी सोचनीय है कि घरेलू हस्तशिल्प उद्योगों पर डंपिंग की मार वर्ष 2014 के लोकसभा के चुनावों में प्रमुख मुद्दा था और केंद्र सरकार ने इन्हे बचाने के लिए , विदेश व्यापार नीति में इन उद्योगों के संरक्षण की बात भी की थी , किन्तु राज्य स्तर पर नीतिगत पहलों की कमी के कारण 4.3 मिलियन से अधिक लोगों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार देने वाले हथकरघा उद्योग हाशिये पर आ गए |

इसके विकास के लिए सरकार ने संवर्धन और विकास कार्यक्रम आरम्भ किये | सरकार ने राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम के अंतर्गत जिला स्तर पर कौशल उन्नयन , प्ररियोजना प्रबंधन और डिजाइन विकास के लिए 50 लाख की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की | इसके अतिरिक्त शहरी हाट, बुनकर मुद्रा योजना और व्यापक हथकरघा क्लस्‍तटर लिकास योजना की भी शुरुआत की | हस्तशिल्प कारों/बुनकरों को प्रत्यक्ष सुविधाधाए प्रदान करने तथा बिचौलियों को समाप्त करने के लिए 38 शहरी हाट स्वीकृत किये गए | साथ ही 23 ई-कॉमर्स संस्थाओं को हथकरघा उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री के लिए अनुबंधित किया गया है | सरकार द्वारा किये गए प्रयास पूर्ति आधारित हैं और नीयत से अच्छे हैं ,किन्तु हथकरघा उद्योग मांग की समस्या से न जूझें इसके लिए भी एक समग्र प्रयास की जरूरत है |

नए भारत में गांधी के ग्राम स्वराज और आत्मनिर्भरता के स्वपन को तब तक नहीं पाया जा सकता जब तक जन मानस विदेशी वस्तुओं के प्रदर्शन के प्रभाव से निकलकर देशी वस्तुओं को नही अपनाएगें | मध्य प्रदेश के कच्छ की कसीदाकारी, मुरादाबाद के पीतल के बर्तन , फिरोजाबाद की चूड़ियां , छत्तीसगढ़ का ढोकरा , कश्मीर की शाल और बरेली के इत्र , कांजीवरम की साड़ियां , पीपरी के कागज और असम का मूंगा शिल्क जब फिर से लोगों के ह्रदयों में स्थान बनायेगें तो देश की आर्थिक और नैतिक प्रगति दोनों ही होगी | देश के पूंजी का देश से बाहर बहिर्गमन कम होगा और साथ ही साथ कम होगी विदेशी पूंजी पर निर्भरता | ये ही आत्म निर्भर भारत की प्रथम सीढ़ी है क्योंकि कहा जाता है कि विश्व की सम्पूर्ण शक्तियों के विनाश पर भी जो एक हुनर बचा रहा सकता है वो है “हस्त कला विज्ञान “| | ये हस्तकला विज्ञान तो भारत की अमूल्य सांस्कृतिक और राष्ट्रीय धरोहर है | क्या इसे बचाना हमारा कर्तव्य नहीं ?


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