समाजवादी पार्टी में सम्मान के साथ शामिल होंगे शिवपाल सिंह यादव: सूत्र


ब्यूरो रिपोर्ट:

लखनऊ। मेरी यह व्यक्तिगत आकांक्षा रही है कि समाजवादी धारा के सभी लोग एक मंच पर आएं और एक ऐसा तालमेल बनें जिसमें सभी को सम्मान मिल सके और प्रदेश का विकास हो सके । मैं चाहता हूं कि एक बार फिर 2022 के विधानसभा चुनाव से सभी समाजवादी एक मंच पर दिखें। मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं है। मैंने पहले भी कहा था कि अगर हम लोहियावादियों, गांधीवादियों, चरणसिंहवादियों और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक जगह ला सके तो साम्प्रदायिक शक्तियों को रोक सकते हैं।

इस स्वप्न को साकार करने के लिए मैंने 2015 से ही ऐसी ताकतों के महागठबंधन के लिए पहल शुरू कर दी थी। जेडीयू, आरजेडी और रालोद सहित अन्य समाजवादी विचारधारा के नेताओं को लखनऊ में 05 नवम्बर 2016 में हुए समाजवादी पार्टी के रजत जयंती समारोह में भी इसी उद्देश्य से आमंत्रित किया गया। हालांकि इस मौके पर किसी गठबंधन की औपचारिक घोषणा नहीं हुई, लेकिन समारोह में मौजूद राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष अजित सिंह, जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के वरिष्ठ नेता शरद यादव, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) मुखिया लालू प्रसाद यादव और जनता दल सेक्युलर के प्रमुख एच. डी. देवेगौड़ा ने एक सुर में नेता जी को गठबंधन की कमान देने की बात कही। सामाजिक न्याय में यकीन रखने वाला हर शख्स इस गठबंधन को उम्मीद से देख रहा था। लेकिन दुर्भाग्य से यह संभव न हो सका। आज की परिस्थिति में भी मैं आपके माध्यम से सभी अमन पसंद लोगों की एक जुटता का आह्वान करता हूं।

जहां तक समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन का प्रश्न है, उसके लिए मुझे अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं है। समाजवादी पार्टी संघर्ष के दम पर बनी थी, उसमें तीन दशक तक बहुत से समाजवादी विचारधारा के लोगों के साथ मैं भी नेताजी के साथ संघर्ष करता रहा। मुझे उम्मीद है कि आने वाली पीढियां भी संघर्ष का पथ चुनेंगी और जनता के हित को सर्वोपरि स्थान देंगी।

एक बात और जो थोड़ी कठोर है और मुझे कहनी चाहिए वो यह कि विपक्ष के लिए यह निर्णायक घडी है। अगर विपक्ष अब भी संघर्ष के लिए तैयार नहीं होता है तो रास्ता बहुत कठिन है।

लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो जनता की राय के अनुरूप अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को मैदान में उतारेंगे। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) ने सीमित अवधि में शानदार संगठन खड़ा किया है और यूपी की सियासत को प्रभावित किया है। अगर 2019 में हमें विपक्षी दलों के गठबंधन में शामिल किया जाता तो लोकसभा चुनाव के परिणाम कुछ और होते।

राजनीति में उतार चढाव एक सामान्य परिघटना है। लोहिया कहा करते थे कि राजनीतिक व्यक्तित्व की असल पहचान चुनावों में उसके आचरण से होती है। वैचारिक मतभेद के बावजूद किसी से मेरा मनभेद नहीं रहा। चुनाव में मैंने कभी भी किसी के लिए असंसदीय शब्द का उपयोग नहीं किया।

वैश्विक आपदा की वजह से हुए लॉकडाउन से समाज के सभी तबकों को बहुत संकट का सामना करना पड़ा। समाज का कमोबेश हर तबका निराशा का सामना कर रहा है। गरीब भुखमरी का शिकार है। मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई है। किसान, नौजवान की आंखों के आगे अंधेरा हैं। श्रमिक और कारोबारी तंगहाली में आत्महत्याएं कर रहे हैं।

निश्चय ही आपदा से उपजा अप्रवासियों का संकट सबसे गंभीर है। अप्रवासियों के सामने आजीविका का संकट है। ऐसे में उनके गावों में ही रोजगार सृजन की आवश्यकता है। मनरेगा के तहत श्रमिकों के लिए कार्यदिवस व दिया जाने वाला दैनिक भत्ता बढ़ाने कि जरूरत है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रवासी मजदूरों के हितों को ध्यान में रखकर श्रमिक-कामगार कल्याण आयोग का गठन किया गया है । यह एक सराहनीय पहल है।

देश व प्रदेश की नौकरशाही द्वारा इस आपदा से निबटने में उठाए गए कदम अक्षम व अपर्याप्त रहे हैं। साथ ही बेहतर होता कि आपदा प्रबंधन के क्रियान्वयन में नौकरशाही व जनप्रतिनिधियों के समन्वय पर और अधिक जोर दिया जाता। अगर अधिकारी जनप्रतिनिधियों के अनुभव का लाभ उठाते व एक बेहतर समन्वय के साथ कार्य करते तो निश्चय ही आज मजदूर, कामगारों व अन्नदाताओं को इतना अधिक परेशान नहीं होना पड़ता। इस संकट के समय तो ऐसा लगा जैसे जनप्रतिनिधियों को ही क्वारन्टीन कर दिया गया है, उनके समस्त वित्तीय अधिकार सीज कर दिए गए । अगर विधायकों व सांसदों को उनके निधि के एक हिस्से के इस्तेमाल का अवसर दिया जाता तो मदद की पहुंच ज्यादा व्यापक होती।

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर चुनौतियां बहुत बड़ी हैं। सरकार द्वारा दिया गया आर्थिक पैकेज पर्याप्त नहीं है। लॉकडाउन से उपजी परिस्थितियों में सब्जी, फल व दुग्ध उत्पादक, मुर्गीपालक, मत्स्य पालक और लघु पशुपालक भयानक आर्थिक चुनौतियों से लड़ रहे हैं। उत्पाद का वाजिब दाम न मिलने से किसानों को वैश्विक आपदा की दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। आपदा से छोटे व मध्यम व्यवसायी बुरी तरह से प्रभावित हैं। रोजाना कमाई कर परिवार का भरण पोषण करने वाले रेहड़ी-पटरी व ठेले वालों के सामने भी रोजी-रोटी का भयानक संकट आ खड़ा हुआ है। मध्य वर्ग अलग ही दबाव का सामना कर रहा है।

कोरोना संकट की वजह से कचहरी बंद होने से अधिवक्ताओं को भी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।टैक्स में छूट व कर्ज माफी जैसे उपायों के साथ ही इस वर्ग को एक बड़े आर्थिक पैकेज व संरक्षण की जरूरत है। सरकार द्वारा अतिरिक्त राहत पैकेज के माध्यम से देश के संगठित व असंगठित क्षेत्र को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। अल्पकालिक समय के लिए टैक्स में राहत जैसी पहल से लोगों के हाथ में अतिरिक्त आय होने से अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ेगी और आर्थिक विकास को गति मिल सकेगी।

प्रदेश में नॉन कोविड चिकित्सा केंद्र भयानक उपेक्षा के शिकार हैं। आपातकालीन सेवाओं में सन्नाटा पसरा है, मरीज भटक रहे हैं। निजी व सार्वजनिक चिकित्सा केंद्रों पर चिकित्सकों की उपस्थिति सुनिश्चित कराने में प्रदेश सरकार विफल रही है। जिला अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में ओपीडी न खुलने से जनता को बहुत परेशानी हो रही है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त, उत्तर प्रदेश राज्य सहकारी समिति निर्वाचन आयोग द्वारा बैंक के निर्वाचन हेतु अधिसूचना जारी की गई है, जिसके अनुसार बैंक के निर्वाचन की प्रक्रिया दिनांक -21.08.2020 से प्रारम्भ होनी हैं क्योंकि बैंक का निर्वाचन गांव स्तर पर स्थापित बैंक शाखाओं के सदस्यों द्वारा किया जाता है और शाखा स्तर पर निर्वाचन हेतु प्रत्येक प्रत्याशी को प्रचार हेतु गांव – गांव भ्रमण करके सदस्यों से सम्पर्क करना होता है। किन्तु कोरोना महामारी को देखते हुए निर्वाचन हेतु प्रचार कर पाना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है। बहुत से संभावित प्रत्याशी और मतदाता वर्तमान में या तो कोरोना संक्रमित के सम्पर्क में आने से क्वारंटाइन में हैं या स्वयं कोविड से संक्रमित हैं। यदि बैंक का निर्वाचन इस दौरान सम्पन्न कराया जाता है तो ऐसे में सरकार द्वारा जारी स्वास्थ्य दिशनिर्देशों का पालन करना भी सम्भव नहीं है। उपर्युक्त सभी तथ्यों व मुख्य निर्वाचन आयुक्त के आदेश पर विचार करते हुए शासन द्वारा कोरोना आपदा के नियंत्रित होने तक उ०प्र० ग्राम्य विकास बैंक की समस्त शाखाओं का निर्वाचन स्थगित किया जाना चाहिए।

हमारा यह भी मानना है कि देश में किसानों के लिए स्पष्ट नीति का आभाव है। किसानों को न लाभकारी मूल्य मिल पा रहा है , और न ही सस्ते ऋण, उर्वरक व बीज की सुलभता को लेकर सरकार के पास कोई स्पष्ट नीति है । बाज़ार के आभाव में किसान अपनी फसलों को सड़क पर फेंकने को विवश है । आखिर जिस तरह उद्यमी अपने उत्पाद का मूल्य तय करता है, उसी तरह किसानों को भी अपने कृषि उत्पाद का मूल्य तय करने का अधिकार है। अतः प्रसपा यह मानती है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने का अधिकार सरकार का न होकर किसानों का है।
प्रसपा (लोहिया) अंतराष्ट्रीय, राष्ट्रीय व प्रांतीय के साथ ही गांव व बूथ स्तर की समस्याओं को उठाने के लिए प्रतिबद्ध है । जहां पार्टी ने गांव, किसान, नौजवानों, मजदूरों, मजलूमों, मुसलमानों व अल्पसंख्यकों की लड़ाई लड़ी है, वहीं पर प्रसपा ने चीन द्वारा भारतीय भूमि पर किए जा रहे अतिक्रमण, अंतरराष्ट्रीय बाजार में घटते तेल के दाम के बावजूद भारतीय बाजार में यथावत स्थिर तेल की कीमतों, पाकिस्तान द्वारा जारी आतंकवाद , प्रदूषण व ग्लोबल वार्मिंग जैसे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय विषयों पर अपना स्पष्ट , सार्थक व निष्पक्ष दृष्टिकोण रखा है। अंतराष्ट्रीय मोर्चे पर सरकार पूर्णतया विफल रही है । विदेश नीति की नाकामी की निशानी है कि हमारे सम्बन्ध अपने मित्र देशों से भी खराब हो गये हैं, या पहले जैसे नहीं रहे ।

हम ऐसी आर्थिक नीतियों का पुरजोर समर्थन करते हैं जिनसे आर्थिक विषमता व बेरोजगारी घटे तथा आर्थिक विकेंद्रीकरण को बढ़ावा मिले । साथ ही स्वदेशी तकनीक व पूंजी के माध्यम से आर्थिक विकास का मॉडल चुना जाए। स्वदेशी व आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए देश को बुनकरों व कारीगरों के साथ ही स्वदेशी तकनीक, पारम्परिक ज्ञान- विज्ञान को बढ़ावा देना होगा।


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