सार्वजनिक नीतियों का बदलता स्वरूप और प्रधानमंत्री मोदी की जनलोलुपता


लेखक: विजय श्रीवास्तव (सहायक आचार्य अर्थशास्त्र विभाग, लवली प्रोफेशनल विश्विद्यालय)
सह-लेखक: दीपक कौशल

किसी भी अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास और जनकल्याण इस बात पर भी निर्भर करता है कि उस राष्ट्र की सार्वजनिक नीतियां किस प्रकार की हैं और उनका अनुपालन कैसे किया गया है| यह कथन सभी प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं के लिए समान रूप से लागू होता है | चाहे वो अर्थव्यवस्था अल्प विकसित हो , विकासशील या विकसित| नीतियों के निर्माण की प्रक्रिया में भिन्नतायें हो सकती हैं किंतु अर्थव्यवस्था में लागू की गई सार्वजनिक नीतियों का स्वरूप कैसा है ? इसका निर्धारण देश की नीति नियामक संस्थाओं और विभिन्न स्तर की सरकारों द्वारा किया जाता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में भी यह कथन सार्वभौमिक सत्य है | ऐतिहासिक अवलोकन करने पर ज्ञात होता है ,कि भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात आयोजन की जो पद्धति अपनाई गई थी वो एक साम्यवादी समाज की परिकल्पना पर आधारित थी और इसलिए भारत के योजना काल के प्रारंभिक दिनों में हमें समाजवादी सामाजिक नीतियां देखने को मिलती हैं | भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु जी का यह मानना था कि “भारत की प्रगति समृद्धि तथा इसका स्तर ऊपर उठाने के लिए हम समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते हैं इसमें हमारी दृढ़ता में कोई कमी नहीं है | लेकिन हम अन्मय यामताग्रही किस्म का समाजवाद नहीं लाना चाहते हैं | “यह कथन नेहरु जी ने तृतीय पंचवर्षीय योजना के प्रारूप में बहस के दौरान 1960 में दिया था |

भारत ने अपने आरंभिक योजना काल में जन उन्मुख और संरचनात्मक हस्तक्षेप के सिद्धांतों को अपनी नीतियों में स्थान दिया था और लगभग 3 दशकों तक सार्वजनिक नीतियां मूल प्रकार नियामक प्रकार और वितरणात्मक प्रकार की थी | इन तीनों ही प्रकार की नीतियों का उद्देश्य योजना के उद्देश्यों से एक समन्वय बनाने में मदद करना था जिससे आर्थिक वृद्धि के साथ सामाजिक कल्याण भी प्राप्त किया जा सकें| उदाहरण के तौर पर 1953 में किया गया एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण , वर्ष 1956 में किया गया जीवन बीमा का राष्ट्रीयकरण ,1951 में वित्त आयोग की स्थापना भारतीय भंडारण निगम 1956 की स्थापना 1969 मैं बैंकों का राष्ट्रीयकरण तथा बंधुआ मजदूर उन्मूलन तथा नियम 1976| कहने का अर्थ यह है कि वर्ष 1950 से लेकर 1980 तक का भारत का योजना काल सार्वजनिक नीतियों की सर्व सामान्य स्वीकार्यता को दर्शाता है| किंतु इसमें राजनीतिक विचारधारा को उतना महत्व नहीं दिया गया जितना राजनीतिक आलोचक समझते हैं नेहरू से इंदिरा तक का प्रधानमंत्रीत्व काल उच्च कोटि की सामाजिक नीतियों के निर्माण का काल है | यद्यपि नीतियों के क्रियान्वयन में निचले स्तर पर भारी भ्रष्टाचार दृष्टिगत होता है किन्तु फिर भी हम इन नीतियों के सामाजिक पक्ष की गहराई और उसके संतुलित प्रभाव की अनदेखी नहीं कर सकते |

देश में केंद्रीय सत्ता के परिवर्तन और क्षेत्रीय दलों के उभार के कारण अगले दो दशक की नीतियां जन उन्मुख ना रहकर उद्योग -मुखी हो जाती हैं और इनमें जनकल्याण का पुट कम रह जाता है | उदाहरण के तौर पर 1985 का औद्योगिक कंपनी अधिनियम , विनिवेश अधिनियम 1991 राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम 1988 भारतीय प्रतिभूति अधिनियम 1992 और विनिमय अधिनियम 1991 शामिल है| इन दो दशकों में नीतियों को अधिकांश स्वरुप नियामक और पूंजीकरण प्रकार से बनाया गया है| इसी दशक में भारत में सार्वजनिक नीतियों के सौदा कारी विचार का भी उदय हुआ | इस दशक की सार्वजनिक नीतियां राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रभावित थी | और इनमें संरचनात्मक हस्तक्षेप के साथ व्यवस्था परिवर्तन भी हुआ | नीतियों के निर्माण में भी लोकतांत्रिक तर्कशीलता की कमी भी सामने आयी | वाशिंगटन सम्मेलन के सुझावों को आधार मानते हुए दशक की नीतियां आर्थिक वृद्धि के टप्पन के सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाई गई थी | भूमंडलीकरण के दशक कि यह नीतियां वास्तव में रोजगारविहीन वृद्धि ,आधार- विहीन वृद्धि और वाणी विहीन वृद्धि और क्रूर वृद्धि की अवधारणाओं को जन्म देती हैं | दूसरे शब्दों में जहां 3 दशक की नीतियां चाहे वह मूल प्रकार की या विवरणात्मक जन केंद्रीय थी किंतु उदारीकरण के बाद भी नीतियां पूर्णतया बाजार उन्मुख थी | सन 2000 के बाद भारत में नीतियों के निर्माण में एक द्वैतवाद दिखाई देता है | जहां एक ओर अधिकार आधारित सामाजिक नीतियां बनाई गई उद्योग -उन्मुख पूंजीवादी नीतियां बनाई गई उदाहरण के तौर पर यह राष्ट्रीय खाद सुरक्षा अधिनियम 2013 महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना 2005 प्रधानमंत्री जनधन योजना 2014 वस्तु और सेवा कर अधिनियम 2017|

वर्तमान मोदी सरकार ने जो जन उन्मुख मूल प्रकार की जो सार्वजनिक नीतियां बनाई हैं वास्तविक तौर यह नीतियां किसी राजनीतिक छिपे हुए एजेंटों जैसी लगती हैं |इन नीतियों में विधि करण की प्रक्रिया ,हित धारकों के विचारों को सम्मिलित करने की प्रक्रिया, सामान दृष्टिकोण के सम्मान देने की प्रक्रिया और विभिन्न बहुलतावादी सिद्धांतों को प्राथमिकता देने की प्रक्रिया का एक प्रकार से संवैधानिक उल्लंघन हुआ है | यह नीतियां क्रोनी कैपिटलिज्म बढ़ावा ही देंगी | चाहे वह दिखने में जन उन्मुख क्यों ना हो? इसका कारण प्रधानमंत्री मोदी का जनलोलुप होना है , जहां उनके सारे नीतिगत निर्णय जनता की भावनाओं को उद्देलित कर के लिए जाते हैं तर्कशीलता के आधार पर नहीं | अंग्रेजी भाषा में इसे “डेमोगोगिक” कहते है | केंद्रीय सत्ता के प्रतिनिधि का जन लोलुप होना देश की बहुलतावादी संस्कृति के लिए बहुत बड़ा खतरा है| उदाहरण के लिए नीतियों के विज्ञापन पर किए जाने वाला भारी खर्च और उन नीतियों को एक विशेष बहुसंख्यक समाज से जोड़ना, एक विशेष वर्ग को उन नीतियों के लाभ से वंचित कर देगा और उनके अंदर एक भय पैदा करेगा| प्रधानमंत्री मोदी की जन्म मुखी नीतियां वास्तव में विघटनकारी प्रगति की हैं , क्योंकि उनका अंतिम उद्देश्य जन लोलुपता और ध्रुवीकरण के माध्यम से सत्ता हथियाना है ना कि जन कल्याण । वैचारिक मत विभिन्ताओं और लोकतांत्रिक प्रर्किया में इस प्रकार की जनलोलुपता सरकारों के तर्कहीन होने का प्रमाण है | उदाहरण के लिए , नई शिक्षा नीति में स्पष्ट रूप से संसदीय बहसों से उपजे किसी भी अलग मत या विचारधारा के सुझावों को स्थान नहीं दिया गया है | वैचारिक मत विभिन्ताओं और लोकतांत्रिक प्रर्किया में इस प्रकार की जनलोलुपता का होना सरकारों के तर्कहीन होने का प्रमाण है | लेकिन जनलोलुपता के लिए इसे भाषा के सवाल से जोड़ा जा रहा है | भाषाओं का संरक्षण और ज्ञान का विकेन्द्रीकरण आवश्यक है , किंतु हिंदुत्व और और कोरे राष्ट्रवाद की चासनी अपने जनप्रिय भाषणों में परोसने वाले प्रधानमंत्री मोदी इसे नहीं समझ सकेंगें | क्योंकि जनलोलुपता ही उनकी जनप्रियता का आधार है और इसका दुष्परिणाम सार्वजनिक नीतियों की असफलता के रूप में आएगा |


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